TERE SHAHAR SE ......... शहर से गुज़रते हुऐ

शहर से गुज़रते हुऐ 


शहर से गुज़रते हुऐ 

ख्याल इक नर्म सा फिर सरगोशी कर गया , 
नम कर गया मेरा हर लम्हा 
याद इक भूली सी उभर आई 
ज़हन की गीली दीवारों से ....
जब गुज़रा फिर शहर से तेरे 
नज़्मों की कोठरी से होले से छुपा दर्द  फिसल गया , 
खुल गई गिरहें , बन्द पोटली की 
रगींन पल उचक - उचक बाहर आने लगे 
तेरे अहसास की अचकन लिपट गई
 दिल के चहुँ और , 
तेरे आँगन की अमराई की महक में
 ये मन फिर से बहक गया ... 

खींच लेती है वही रगं ,
वही गंध से लदी हुई डालियाँ ....
और वोह  !  
सड़क जो तुम तक पहुँचती है , 
पेड़ नीम की बौर से ढके है और कुछ दूर
हाँ थोड़ा दूर .... 
चटख नारंगी सेमल धधक रहा है... 
जैसे आग लगी हो ... 
तुम्हारे घर की दीवार से सटी , 
उस रात की रानी ने यादें फिर रंग दीं हैं 
और ... 
मन फिर उन्ही महुआ की रातों में 
जैसे घुल सा गया है  
इक मीठे से ज़ायक़े ने रूह को 
रोशन कर दिया ...
ले आती है  मेरी वफा हर बार तुम तलक 


शहर से गुज़रते हुऐ ...

बिल्कुल तुम्हारे  प्यार की तरहा ... 

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